WorldNews.Forum

आपके थेरेपिस्ट को क्या नहीं बताया जा रहा है? संस्कृति का वो अदृश्य जाल जो मानसिक स्वास्थ्य को मार रहा है

By Diya Sharma • December 17, 2025

मनोविज्ञान का अनकहा सच: आपकी भावनाएँ भी 'कल्चर' की गुलाम हैं

हम सोचते हैं कि थेरेपी का कमरा एक सुरक्षित, तटस्थ स्थान है जहाँ हमारी आत्मा बिना किसी लाग-लपेट के खुलती है। यह एक भ्रम है। सत्य यह है कि मनोवैज्ञानिक उपचार (Psychological Treatment) की पूरी प्रक्रिया एक अदृश्य सांस्कृतिक फिल्टर से होकर गुजरती है। जिस क्षण आप अपने दुख को व्यक्त करने के लिए शब्द चुनते हैं, आप अनजाने में अपनी सांस्कृतिक भावनात्मक मानदंडों के अधीन हो जाते हैं। यह केवल 'भारत में लोग दुख नहीं दिखाते' वाली बात नहीं है; यह कहीं अधिक गहरा और खतरनाक है। यह वह जगह है जहाँ मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) के आंकड़े गलत दिशा में जा रहे हैं।

द अनस्पोकन ट्रुथ: कौन जीतता है, कौन हारता है?

अधिकांश पश्चिमी-प्रशिक्षित थेरेपी मॉडल, जो आज भारत सहित दुनिया भर में हावी हैं, एक विशिष्ट 'अभिव्यंजक' व्यक्तित्व (expressive personality) को आदर्श मानते हैं। वे मानते हैं कि समस्या को जोर से और स्पष्ट रूप से नाम देना ही समाधान की ओर पहला कदम है। लेकिन भारत जैसे कलेक्टिविस्टिक समाजों में, जहाँ 'परिवार की प्रतिष्ठा' या 'सामूहिक सद्भाव' व्यक्तिगत अभिव्यक्ति से ऊपर है, यह मॉडल विफल हो जाता है।

जो जीतता है: थेरेपिस्ट जो 'मानक' भाषा समझते हैं। वे उन क्लाइंट्स को जल्दी निदान कर पाते हैं जो पश्चिमी मानदंडों के अनुरूप अपनी पीड़ा को 'एंग्जायटी' या 'डिप्रेशन' के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

जो हारता है: वह व्यक्ति जो अपनी निराशा को शारीरिक लक्षणों (सोमैटाइजेशन), अत्यधिक विनम्रता, या 'रिश्तों में तनाव' के रूप में व्यक्त करता है, क्योंकि ये अभिव्यक्तियाँ सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य 'शांत' व्यवहार मानी जाती हैं। उनका वास्तविक संकट अनसुना रह जाता है। यह एक प्रकार का सांस्कृतिक पूर्वाग्रह है जिसने चिकित्सा के क्षेत्र में जड़ें जमा ली हैं। (अधिक जानने के लिए, आप सांस्कृतिक मनोविज्ञान पर अकादमिक साहित्य देख सकते हैं)।

गहन विश्लेषण: ऐतिहासिक जड़ें और वर्तमान विफलता

यह समस्या केवल आज की नहीं है। आधुनिक मनोविज्ञान का जन्म औद्योगिक क्रांति के बाद पश्चिमी समाजों में हुआ, जहाँ व्यक्तिवाद (Individualism) चरम पर था। उस ढांचे को उठाकर सीधे एक ऐसे समाज पर थोपना जहाँ 'कर्तव्य' सर्वोपरि है, एक विसंगति पैदा करता है। जब एक भारतीय क्लाइंट कहता है, "मैं अपने माता-पिता को निराश नहीं करना चाहता," तो एक पश्चिमी-प्रशिक्षित थेरेपिस्ट इसे 'आत्म-बलिदान' के रूप में देख सकता है, जबकि क्लाइंट के लिए यह 'नैतिक कर्तव्य' है। दोनों की व्याख्याएँ जमीन-आसमान का अंतर रखती हैं।

विपरीत दृष्टिकोण (Contrarian Take): हमें थेरेपी को और अधिक 'वैश्विक' बनाने की जरूरत नहीं है; हमें इसे स्थानीय स्तर पर 'जमीनी' बनाने की जरूरत है। वर्तमान ट्रेंड यह है कि थेरेपिस्ट अधिक 'सेंसिटिव' होने का दावा करते हैं, लेकिन वे केवल सतही सांस्कृतिक संकेतों को पहचानते हैं, अंतर्निहित भावनात्मक अर्थों को नहीं।

भविष्य की भविष्यवाणी: आगे क्या होगा?

अगले पाँच वर्षों में, हम दो समानांतर रुझान देखेंगे। पहला, 'डिजिटल थेरेपी' का उदय होगा, जहाँ AI-संचालित उपकरण सांस्कृतिक बारीकियों को पकड़ने की कोशिश करेंगे, लेकिन वे असफल रहेंगे क्योंकि भावनाएँ मशीन-पठनीय नहीं होतीं। दूसरा और अधिक महत्वपूर्ण, उच्च-स्तरीय क्लीनिकों में 'एथनोग्राफिक थेरेपी' (Ethnographic Therapy) की मांग बढ़ेगी—ऐसे चिकित्सक जो न केवल मनोविज्ञान जानते हैं, बल्कि क्लाइंट की विशिष्ट उप-संस्कृति, भाषा और सामाजिक पदानुक्रम को भी समझते हैं। जो चिकित्सक इस सांस्कृतिक डीप-डाइव के बिना काम करना जारी रखेंगे, वे केवल सतही लक्षणों का इलाज करेंगे, जबकि अंतर्निहित सांस्कृतिक संघर्ष अनसुलझा रहेगा। यह चिकित्सा जगत के लिए एक बड़ा संकट बनने वाला है।

इस विषय पर अधिक जानने के लिए, आप विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की मानसिक स्वास्थ्य रिपोर्टों का अध्ययन कर सकते हैं जो सांस्कृतिक अनुकूलन पर जोर देती हैं।